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अक्स की दो बुन्दे

                
                                                         
                            मेरे मतिष्क के किसी कोने छिपी हैं उनकी यादें
                                                                 
                            
जो समय- समय पर आ जाती है उनकी यादें
नम हो जाती हैं दोनों आंखें जब आती है उनकी यादें
संभाल न पाती आंखें ,छलक जाती है
अश्क की दो बुन्दें
बहुत पुरानी कहानी है इन अश्कों के दो बुन्दों में
न कोई छबि है न दोनों आंखों न मतिष्क में
मुझे उनके दोनों हाथों से सहलाने की कोमल अहसास
मेरे मतिष्क के किसी कोने छिपी है उनकी यादें
कभी- कभी मुझे अपने पर तरस आता है
मेरी उस समय नन्हीं सी आंखें
उनकी तस्वीर क्योंकर न कैंद कर पाई
मेरे को इस दुनिया लाने वाली मां की आंखें
अभी भी मेरे जहन में, मेरे आंखों में छुपी है उनकी यादें
मेरी को जन्म देने वाली प्यारी मां
जब भी उनकी याद आती है
छलक जाती है अश्क की दो बुन्दे
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एक महीने पहले

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