विचित्र है आदमी
अपने कद से बड़ा दिखना चाहता है आदमी
कालचक्र के चक्र को रोकना चाहता है आदमी
कभी मृदुल बयार को झंझावात समझ लेता है आदमी
कहीं उठते-गिरते लहरों को तूफान समझ लेता है आदमी
अपने अंदर के हलचल को कभी-कभी भूचाल समझ लेता है आदमी।
तोला से माशा और माशा से तोला
कभी-कभी डगमगाता और सॅंभलता चलता है आदमी
हैरानी और अचम्भा, कैसा विवरण !
कठिनाई के क्षणों में एकनिष्ठ आदमी
संघर्ष के पलों में गजब की आत्म-स्फूर्ति दिखलाता है आदमी।
विचित्र और बड़ा विचित्र है आदमी
-नाग मणि
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