सुनते-सुनते सुनने की आदत हो गई
कहते हैं, मुस्कुरा कर कुछ तो कहो
कहने को भरा था, मानो खजाना
हाय, होठों पर ही शब्द नहीं आये।
ठहाके पर पाबन्दी नहीं है, मगर
गूॅंज की चौहद्दी कहाॅं है!
किसी ने कहा , हॅंसा भी करो
यहाॅं मुस्कुराने की अदा भा गई।
पलकों को शर्माने की आदत है
नयनों ने चुपके से तोड़ा,वो बंधन
न कहना , न सुनना, न निहारने की सीमा
धीमे से उठती पलकों ने बतला दी कहानी।
-नाग मणि
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