शीर्षक - सोचे
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इतिहास गवाह है।
इंसान ही इंसान ,
से छल फरेब रखता है।
बस......
मन की सोच रखते हैं।
चाहत और प्रेम में,
धोखे और लालच रखते हैं।
हम तुम सब सांसों के मेहमान,
हम सब मिलकर सोचे.....
और ....
बस सब कुछ यहीं रह जाता हैं।
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