शीर्षक -मेरे अपने...... वहम
**********************
मेरे अपने न कोई बस तुम हम हैं।
न तेरा न मेरा निःस्वार्थ रहते हैं।
जीवन के सच मृत्यु जवां देखी है।
मेरे अपने पराए सब हम जानते हैं।
धन और संपत्ति की सोच रखते हैं।
रिश्ते नाते न मेरे अपने समय होता हैं।
नीरज मेरे अपने का सच लिखते हैं।
एक-दूसरे को ज्ञान और सच कहते हैं।
सच तो वो ही न खुद अपने हो पाएं है।
हां मेरे अपने ही बस अपने में समेटे है।
मेरे अपने अपनी सोच अहम रखते हैं।
न एहसास न कोई परिभाषा समझते हैं।
मेरे अपने ही दुःख खुशी बस चाहते हैं।
न तेरा विश्वास और विचार हम करते हैं।
सच बस यही तो आज मेरे अपने होते हैं।
आओ हम सोच बदल अकेले ही चलते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X