शीर्षक - हम सबके स्वार्थ
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हम सबके स्वार्थ अपने हैं।
जीवन और जिंदगी जीते हैं।
ख्बाव और हालात होते हैं।
हम सबके स्वार्थ साथ हैं।
नीरज हम सबके स्वार्थ हैं।
कल की उम्मीद झूठी होती हैं।
आशाएं और उम्मीद न पूरी हैं।
पल पल उम्र और हम होते हैं।
बस समय हम सबके स्वार्थ हैं।
प्रेम प्यार चाहत हम सब करते हैं।
कही न कही हम सबके स्वार्थ हैं।
सच कड़वा रहे बस समझते हैं।
हम सबके स्वार्थ मन भाव होते हैं।
संग साथ ये जमीन न जातीं हैं।
बस कर्म की गठरी मोक्ष देती हैं।
हां वरना चक्कर लगाते रहते हैं।
हम सबके स्वार्थ ही कर्ज बनते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल
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