अबोध बालक हम सब होते है।
कुदरत के रंगमंच पर किरदार हैं।
अबोध हम सभी अपने विचार हैं।
प्रेम प्यार चाहत हम समझते हैं।
बस धोखे छल फरेब स्वार्थ हैं।
नीरज भी अबोध सच लिखते हैं।
एहसास और एतबार अबोध हैं।
तेरे मन भाव में हम तुम होते हैं।
एक-दूसरे को अबोध बन जाते हैं।
जीवन के साथ हम तुम चलते हैं।
सब मोह माया बस संग साथ हैं।
हर एक कभी न कभी अबोध हैं।
सच एक दूसरे को हम समझते हैं
आओ हम सब फिर अबोध बनते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल
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