क्या लिखूँ अपनी ज़िंदगी का फ़साना मैं,
कैसे सुलझाऊँ अपनी ज़िंदगी का तराना मैं।
क्या दिखाया है, और क्या दिखाएगी ज़िंदगी,
कैसे चुकाऊँ अपनी ज़िंदगी का नज़राना मैं।
ये ज़िंदगी भी कुछ अलग ही चाहती है,
कुछ और होती है, कुछ और ही दिखाती है।
न समझ पाया इसे, न समझ पाऊँगा कभी,
कैसे सुनाऊँ अपनी ज़िंदगी का अफ़साना मैं।
जो मिला दर्द, उसे चुपचाप सह गया,
मेरी ख़ामोशी का हर राज़ दिल में ही रह गया।
जैसे अब तक सहा है, वैसे ही सह जाऊँगा,
कैसे सँभालूँ अपनी ज़िंदगी का ख़ज़ाना मैं।
हर मोड़ पर नए इम्तिहान मिलते रहे,
कुछ अपने बिछड़ते रहे, कुछ सपने बदलते रहे।
फिर भी उम्मीद का दीप जलाए चलता हूँ,
इसी हौसले से हर अँधेरा टालता हूँ।
क्या लिखूँ अपनी ज़िंदगी का फ़साना मैं,
कैसे सुलझाऊँ अपनी ज़िंदगी का तराना मैं।
जो भी मिला, उसे अपनी तक़दीर मान लिया,
मुस्कुराकर हर दर्द को अपना हमसफ़र जान लिया।
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