आज मैं अपने ही भीतर
एक अंतिम रण छेड़ दूँगा,
निराशा की हर काली छाया
सूरज बनकर मैं भेद दूँगा।
नकारात्मकता की जंजीरों को
आज सदा के लिए तोड़ दूँगा,
मन के हर अंधियारे को
अपने साहस से छोड़ दूँगा।
जो अहंकार कभी सिर चढ़ बैठा,
जो गुरूर आँखों पर छाया था,
जो क्रोध बनकर भीतर सुलगा,
आज वही सबसे बड़ा पराया था।
जो लालच बनकर राहों में
हर पल मुझको भरमाता था,
जो ईर्ष्या बनकर मेरे मन को
धीरे-धीरे खा जाता था।
जो निराशा बनकर सपनों की
हर किरण निगलती जाती थी,
जो उम्मीदों के पंख कतरकर
हर उड़ान रोक जाती थी।
आज उसी से युद्ध मेरा है,
आज उसी से सामना होगा,
या तो वह मिट जाएगा मुझमें,
या फिर मेरा पुनर्जन्म होगा।
वह जलन, जिसने मन के भीतर
धीरे-धीरे आग लगाई,
मुस्कानों की हर फसल उजाड़ी,
आँखों में बस धूल उड़ाई।
वह हीनता, जिसने मेरे "मैं" को
भीतर-भीतर कैद किया,
आत्मविश्वास के दीप बुझाकर
जीवन को निष्प्राण किया।
आज उसी कारागार की
हर दीवार गिरानी है,
अपने ही हाथों अपने मन की
हर बेड़ी तोड़ बहानी है।
घमंड, जो मेरी राहों में
पत्थर बनकर अड़ जाता था,
मंज़िल मेरी सामने होती,
पर हर कदम मुड़ जाता था।
लालच, जिसने आत्मा को
क्षणिक सुखों में बाँध दिया,
सच्चे रिश्तों, सच्चे सपनों का
मूल्य भी मुझसे छीन लिया।
आज न कोई द्वेष रहेगा,
न कोई छल, न कोई भय,
आज हृदय में प्रेम बचेगा,
सत्य रहेगा, शुद्ध अभय।
मैं स्वयं ही अपना शत्रु था,
मैं स्वयं ही अपनी ढाल,
आज स्वयं को जीतने निकला,
यही है जीवन का कमाल।
न कोई और युद्ध बचा है,
न कोई और रणभूमि,
सबसे कठिन विजय वही है—
जो जीते अपनी आत्मभूमि।
आज मैं अपने भीतर से
हर अँधियारा मिटा दूँगा,
टूटे सपनों की हर किरच को
आशा बनकर सजा दूँगा।
कल का मैं अब लौटेगा नहीं,
आज नया विश्वास जगेगा,
राख से उठते फीनिक्स जैसा
मेरा जीवन फिर खिलेगा।
यह मेरा अंतिम युद्ध है,
मेरे मन के अंधकार से,
और मेरी अंतिम विजय होगी
मेरे ही उजले संसार से।
मैं हारूँगा नहीं स्वयं से,
अब यह मेरा दृढ़ प्रण है।
अपने भीतर प्रकाश जगाना—
यही मेरा सच्चा जीवन है।
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