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क्या जीना इसी का नाम है?

                
                                                         
                            क्या जीना इसी का नाम है,
                                                                 
                            
कि पैसा ही हमारा काम है?

हो गए काले यहाँ दिलों के आईने,
मिट गया इंसानियत का ईमान है।
हर चेहरे पर मुस्कान सजती है,
मगर भीतर दर्द का तूफ़ान है।
क्या जीना इसी का नाम है?

कि शोहरत ही हमारी पहचान है,
और किरदार से कोई अनजान है।
अपने ग़म से कम,
दूसरों की ख़ुशियों से ज़्यादा परेशान है।
क्या जीना इसी का नाम है?

यहाँ धोखा भी हुनर बन गया है,
और सच कहना गुनाह बन गया है।
दिल जल रहे हैं फिर भी
लबों पर मुस्कान का सामान है।
क्या जीना इसी का नाम है?

यहाँ ईमान की नहीं,
दौलत की क़द्र होती है।
रिश्तों की गर्माहट नहीं,
ज़रूरतों की फ़िक्र होती है।
क्या जीना इसी का नाम है?

धोखे की नींव पर
रिश्तों के मकान खड़े हैं,
हर कोई अपने चेहरे पर
हज़ारों नक़ाब लिए खड़े हैं।
अपनों से ज़्यादा
पैसे का सम्मान है,
इंसान से पहले
उसकी हैसियत की पहचान है।
क्या जीना इसी का नाम है?
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2 महीने पहले

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