वैसे तो गर्मियों की छुट्टियाँ अब भी आती हैं,
मगर कहाँ वो अपने साथ वो सौगातें लाती हैं।
बचपन तो बीत गया, वो ज़माने चले गए,
बचपन की यादों के वो फसाने चले गए।
अब छुट्टियाँ भी कहाँ पहले-सी लगती हैं,
न वो उमंग है, न वो खुशियाँ जगती हैं।
अब तो छुट्टियाँ भी आराम का ठिकाना लगती हैं,
वो नानीघर जाने के ज़माने चले गए।
न आम के बागों की वो मीठी-सी महक,
न आँगन में गूँजती हँसी की वो चहक।
न मामा-मामी, न भाई-बहनों की वो टोली,
न गर्मियों की दोपहर में शरारतों की होली।
सब कुछ है आज भी, मगर वो बात नहीं,
वो रिश्तों में घुली बचपन-सी मिठास नहीं।
लगता है जैसे वक़्त कहीं पीछे छूट गया,
और हम बड़े हो गए...
बस बचपन वहीं रुक गया।
अब तो छुट्टियों में कहीं जाने से भी मन हट-सा जाता है,
कोई आ भी जाए तो दिल चिढ़-सा जाता है।
कभी यही छुट्टियाँ खिलखिलाने की वजह हुआ करती थीं,
आज वही बस सुकून का ज़रिया बन जाती हैं।
रिश्तों की भीड़ से अब तनहाई अच्छी लगती है,
शोर से कहीं ज़्यादा खामोशी सच्ची लगती है।
न जाने कब बदल गया बचपन से हमारा रिश्ता,
कल तक जिनसे मिलने को दिल मचलता था,
आज उन्हीं से मिलने का मन टल जाता है।
वैसे तो गर्मियों की छुट्टियाँ आज भी आती हैं,
मगर कहाँ वो अपने साथ वो सौगातें लाती हैं...
वो नानीघर जाने के ज़माने चले गए,
बचपन की वो हँसी, वो फसाने चले गए।
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