आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गर्मियों की छुट्टियाँ

                
                                                         
                            वैसे तो गर्मियों की छुट्टियाँ अब भी आती हैं,
                                                                 
                            
मगर कहाँ वो अपने साथ वो सौगातें लाती हैं।
बचपन तो बीत गया, वो ज़माने चले गए,
बचपन की यादों के वो फसाने चले गए।

अब छुट्टियाँ भी कहाँ पहले-सी लगती हैं,
न वो उमंग है, न वो खुशियाँ जगती हैं।
अब तो छुट्टियाँ भी आराम का ठिकाना लगती हैं,
वो नानीघर जाने के ज़माने चले गए।

न आम के बागों की वो मीठी-सी महक,
न आँगन में गूँजती हँसी की वो चहक।
न मामा-मामी, न भाई-बहनों की वो टोली,
न गर्मियों की दोपहर में शरारतों की होली।

सब कुछ है आज भी, मगर वो बात नहीं,
वो रिश्तों में घुली बचपन-सी मिठास नहीं।
लगता है जैसे वक़्त कहीं पीछे छूट गया,
और हम बड़े हो गए...
बस बचपन वहीं रुक गया।

अब तो छुट्टियों में कहीं जाने से भी मन हट-सा जाता है,
कोई आ भी जाए तो दिल चिढ़-सा जाता है।
कभी यही छुट्टियाँ खिलखिलाने की वजह हुआ करती थीं,
आज वही बस सुकून का ज़रिया बन जाती हैं।

रिश्तों की भीड़ से अब तनहाई अच्छी लगती है,
शोर से कहीं ज़्यादा खामोशी सच्ची लगती है।
न जाने कब बदल गया बचपन से हमारा रिश्ता,
कल तक जिनसे मिलने को दिल मचलता था,
आज उन्हीं से मिलने का मन टल जाता है।

वैसे तो गर्मियों की छुट्टियाँ आज भी आती हैं,
मगर कहाँ वो अपने साथ वो सौगातें लाती हैं...
वो नानीघर जाने के ज़माने चले गए,
बचपन की वो हँसी, वो फसाने चले गए।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर