एक कुड़ी थी मस्तानी-सी,
अनदेखी-सी, अनजानी-सी।
आई दोस्ती का हाथ बढ़ाकर,
जैसे पहले से जानी-पहचानी-सी।
करती बातें दिल खोलकर,
जैसे दोस्ती बरसों पुरानी-सी।
हर लफ़्ज़ में अपनापन था,
हर मुस्कान बड़ी सुहानी-सी।
एक कुड़ी थी मस्तानी-सी,
अनदेखी-सी, अनजानी-सी।
जादू था उसकी हर अदा में,
उसकी अदा पे हर कोई फ़िदा था।
भोली-सी उसकी नादानी,
जैसे खुलती कोई नई कहानी।
हँसी उसकी फूलों-सी महके,
बातें उसकी दिल में उतर जाएँ।
जिससे भी मिलती प्यार से मिलती,
हर चेहरे पर मुस्कान बिखर जाए।
एक कुड़ी थी मस्तानी-सी,
अनदेखी-सी, अनजानी-सी।
दोस्ती की वो ऐसी मिसाल बनी,
जो हर दिल में हमेशा बस जानी-सी।
वक़्त गुज़र जाए, मौसम बदल जाएँ,
यादें उसकी कभी न धुँधलाएँ।
ऐसी सच्ची दोस्ती का रिश्ता,
उम्रभर यूँ ही मुस्कुराता जाए।
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