बदलते समय के साथ ज़िंदगी भी बदल गई,
रंग तो बदलते थे, अब स्याही भी बदल गई।
कभी पढ़ते थे जो राग, उनकी रुमानी बदल गई,
पन्ने तो बदलते थे, अब कहानी भी बदल गई।
बदलते समय के साथ ज़िंदगी भी बदल गई,
पन्ने तो बदलते थे, अब कहानी भी बदल गई।
दादा से भी पुराना एक ज़माना था,
जहाँ रिश्तों का अपना ही अफ़साना था।
बचपन में ही माँ-बाप शादियाँ कराते थे,
और बच्चे उम्र भर उन रिश्तों को निभाते थे।
शर्म-ओ-हया थी, लिहाज़ की रवानी थी,
हर रिश्ते में सब्र था, हर वादे में ज़िंदगानी थी।
प्रेम के मायने तब ज़िम्मेदारियाँ हुआ करती थीं,
दो अनजान ज़िंदगियाँ भी एक-दूजे की हुआ करती थीं।
बदलते समय के साथ ज़िंदगी भी बदल गई,
पन्ने तो बदलते थे, अब कहानी भी बदल गई।
फिर एक दौर आया, जब आँखें चार हुईं,
दिलों में मोहब्बत और ख़्वाहिशें बेशुमार हुईं।
एक प्रेमी ने अपनी पत्नी का मान रखा,
हर मुश्किल में उसके प्रेम और सम्मान का ध्यान रखा।
जब अपने ही मित्र ने उसकी मर्यादा को ललकारा,
उसने रिश्ते की ख़ातिर हर रस्म को सँवारा।
दुनिया की परवाह से बढ़कर उसे विश्वास लगा,
अपनी जीवनसंगिनी का सम्मान ही उसके लिए ख़ास लगा।
फिर एक दौर आया, प्रेम के मायने कुछ और हुए,
रिश्तों के फ़ैसले अब दिल के हाथों की डोर हुए।
लड़े, झगड़े, रूठे, फिर मनाने के बहाने हुए,
मगर प्रेम में किसी और के घर न उजाड़ने के इरादे हुए।
अपनी मोहब्बत की ख़ुशी के लिए,
उसने अपनों को मनाया था।
नफ़रत की दीवारें तोड़कर,
प्रेम को सम्मान दिलाया था।
बदलते समय के साथ ज़िंदगी भी बदल गई,
पन्ने तो बदलते थे, अब कहानी भी बदल गई।
फिर मेरे पिता के दौर की एक कहानी सामने आई,
जहाँ प्रेम ने समाज की हर सीमा आज़माई।
एक किन्नर ने एक मर्द की ख़ातिर ख़ुद को क़ुर्बान किया,
मोहब्बत ने दोनों के जीवन को दर्द का एक नाम दिया।
वह अपने प्रेम की ख़ातिर ख़ुद को मिटा बैठा,
और उसका प्रेमी भी गोली से अपनी जान गँवा बैठा।
दो ज़िंदगियाँ थीं, एक प्रेम की कहानी थी,
पर उस कहानी के हिस्से में सिर्फ़ दर्द और वीरानी थी।
न जाने प्रेम था, या समाज की बंदिशों का अँधेरा,
क्यों एक कहानी में खो गया जीवन का सवेरा?
कुछ प्रेम अधूरे रहकर भी यादों में रह जाते हैं,
कुछ सवाल वक़्त के साथ और गहरे हो जाते हैं।
बदलते समय के साथ ज़िंदगी भी बदल गई,
पन्ने तो बदलते थे, अब कहानी भी बदल गई।
और अब के दौर में प्रेम की शुरुआत इंटरनेट से होती है,
अनजान चेहरों से मुलाक़ात, फिर बातों में रात होती है।
न सरहदों का पता है, न शहरों का ठिकाना,
बस एक स्क्रीन के उस पार कोई अपना-सा नज़र आना।
अब दूरियाँ मिटती हैं, तो फ़ासले भी नए हैं,
चेहरे तो हज़ारों हैं, मगर दिल कितने अकेले हैं।
कभी ख़तों में महीनों का इंतज़ार हुआ करता था,
अब एक जवाब न आए, तो दिल बेज़ार हुआ करता है।
कभी प्रेम निभाने में पूरी उम्र गुज़र जाती थी,
अब एक छोटी-सी ग़लतफ़हमी कहानी बदल जाती है।
तब रिश्ते वक़्त के साथ और गहरे हो जाते थे,
अब कुछ रिश्ते वक़्त से पहले ही ख़त्म हो जाते हैं।
न जाने ये तरक़्क़ी है, या रिश्तों की नई रवानी,
हर दौर की अपनी मोहब्बत, हर दौर की अपनी कहानी।
वक़्त बदला, लोग बदले, बदल गई प्रेम की ज़ुबानी,
पन्ने तो बदलते थे, अब बदल गई ज़िंदगानी।
बदलते समय के साथ ज़िंदगी भी बदल गई,
रंग तो बदलते थे, अब स्याही भी बदल गई।
कभी पढ़ते थे जो राग, उनकी रुमानी बदल गई,
पन्ने तो बदलते थे, अब कहानी भी बदल गई।
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