स्वतंत्रता ।
तिरंगा आज गगन में लहराए,
वीरों की गाथा फिर दोहराए,
पर मन से पूछो—क्या सचमुच हम
स्वतंत्र हुए हैं, या केवल पर्व मनाए?
जहां ईर्ष्या की आग जलती हो,
अपनों से ही दूरी पलती हो,
जहाँ मन में टीस निकलती हो—
वहाँ स्वतंत्रता अधूरी है।
जहां पूर्वाग्रह की दीवारें जब
मनुष्य को मनुष्य से बाँटें,
जाति, भाषा, धर्म और वर्ग के
नाम पर रिश्तों के धागे काटें,
वहाँ स्वतंत्रता अधूरी है।
पक्षपात की छाया, जब
न्याय का सूरज ढक जाती है,
योग्यता पीछे छूट जाती है,
और पहचान आगे बढ़ जाती है—
वहाँ स्वतंत्रता अधूरी है।
आजादी केवल सीमा की
रक्षा करने का नाम नहीं,
आजादी केवल उत्सव में
झंडा फहराने का नाम नहीं।
आजादी तो वह चेतना है
जो भेदभाव को मिटा सके,
ईर्ष्या के विष को त्याग
हर हृदय में प्रेम जगा सके।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
न कोई अपना, न कोई पराया,
न पक्षपात की कोई भाषा हो,
न पूर्वाग्रह का कोई साया।
जहाँ अवसर सबको समान मिले,
जहाँ न्याय सभी के साथ चले,
जहाँ प्रतिभा का सम्मान हो,
और सत्य निर्भय होकर बोले।
आओ, इस स्वतंत्रता दिवस पर
एक नया संकल्प उठाएँ—
पहले अपने मन को आज़ाद करें,
फिर देश को और महान बनाएँ।
तिरंगा केवल ध्वज नहीं,
यह समानता का संदेश है;
हर भारतीय के सम्मान में
भारत की सच्ची स्वतंत्रता है।
मन की ईर्ष्या मिटे, पूर्वाग्रह हटे,
पक्षपात की हर दीवार गिरे;
जब हर दिल में इंसानियत जगे,
तभी स्वतंत्रता का असल सूरज खिले।
जय हिंद! 🇮🇳
मुनीर शमी
अण्डाल
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