सच्चा प्रेम नहीं है केवल, रूप-रंग का आकर्षण,
यह तो दो आत्माओं का, एक पवित्र समर्पण।
इसमें न कोई दिखावा है, न कोई झूठा वादा है,
यह तो गंगा जल जैसा, बिलकुल पावन और सादा है।
जहाँ न कोई शर्त छुपी हो, ना ही कोई बंधन हो,
एक-दूजे की खुशियों में ही, जिसका सारा जीवन हो।
पाने की चाहत से ऊपर, उठकर जो बस देना जाने,
दूर रहकर भी जो हर पल, पास होने का अहसास माने।
सुख में जो संग हँसता है, दुःख में जो ढाल बनता है,
बिना कहे जो आँखों से, मन की हर बात समझता है।
वक़्त बदलता है दुनिया में, मौसम भी बदल जाते हैं,
पर सच्चे प्रेमी पतझड़ में भी, वसंत सा मुस्काते हैं।
यह वो धागा है जो दिल को, दिल से सदा जोड़ता है,
तूफ़ान चाहे जितने आएं, यह कभी नहीं टूटता है।
सच्चा प्रेम तो ईश्वर की, एक अनमोल सौगात है,
जिसने पाया इसे जगत में, उसका जीवन साक्षात् है।
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