जब नन्हें नन्हें हाथों से तुम
पेंसिल पकड़ कर लिखती हो क ख ग....
बहुत प्यार आता है तुम पर
कितने जतन से कागज पर उकेरती हो टेढ़े-मेढ़े अक्षर
बड़ी मासूमियत से मुझे देखकर कहती हो
मुझ से नहीं होगा 'मम्मी'
और मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करती हो
अधीर हो कर
तुम पर उस समय वात्सल्य उमड़ पड़ता है
दुलारने का मन करता है
पर अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर
मैं तुम्हें भविष्य के लिए तराशने लगती हूं
नन्हीं हथेलियों को थाम कर
समझाती हूं कि..
नन्हीं परी ये समय अभ्यास का है
प्रतिस्पर्धा के महासंग्राम की नन्हीं सिपाही
तुम्हें आत्मविश्वास नहीं खोना
न अध्ययन में न जीवन में
तुम्हें पढ़ना है और गढ़ना है
एक नया इतिहास
जोड़ना है उत्साह,समृद्धि,स्वाभिमान
और कामयाबी का नया अध्याय
✍️ डॉ. मुक्ता सिंह
केशकुमारी रा.बा.इ.कॉलेज
सुलतानपुर (उ. प्र.)
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