समय की धारा बहती जाए, कौन यहाँ ठहरा है?
मुट्ठी भर यह जीवन अपना, क्यो शोक इतना गहरा है?
कल तक जो था राजमहल में, आज धूल में सोता है,
जिसने जग को जीत लिया था, वह भी जग जग कर रोता है।
न धन साथ, न मान साथ है, न कोई अभिमान चले,
अंतिम पथ पर मनुष्य अकेला, अपने ही कर्मों के साथ चले।
छाया जैसी देह हमारी, साँझ पड़े ढल जाती है,
सत्य वही जो अंत समय में, अंतर-ज्योति जगाती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X