चीख किसी एक की नहीं,
ये युग के विवेक की कहानी है,
जहाँ आँसू तो बहते हैं आँखों से,
पर पत्थर बनी संवेदना पुरानी है।
ये दर्द केवल एक शरीर का नहीं,
ये आत्मा पर किया गया प्रहार है,
ये प्रश्न है उस समाज से,
जिसे अपनी सभ्यता पर बड़ा अभिमान है।
जिस धरती ने संस्कारों की बातें कीं,
जिसने मानवता के गीत सुनाए,
उसी धरती पर क्यों बार-बार
किसी की अस्मिता के दीप बुझाए?
कुछ रातों तक शोर उठता है,
कुछ दिनों तक आक्रोश जलता है,
फिर वही भीड़ लौट जाती है,
फिर वही मौन पलता है।
मोमबत्तियों की लौ बुझ जाती है,
पर पीड़ा की रात नहीं ढलती,
अखबारों की सुर्खियाँ मिट जाती हैं,
पर आत्मा की चोट नहीं मिटती।
कानून के पन्ने बढ़ते गए,
वादों के महल सजते गए,
पर सोच की बंजर जमीन पर
हैवानियत के बीज क्यों उगते गए?
हर बार सवाल उसी से होता है—
"वो कहाँ थी? क्यों बाहर गई?"
पर समाज के कटघरे में खड़े होकर
किसी ने ये आवाज़ क्यों नहीं उठाई—
"वो सोच कहाँ से आई थी,
जिसने इंसान को हैवान बनाया?
किस अंधे अहंकार ने,
किसी के सम्मान को मिटाया?"
जिसने उसकी गरिमा को कुचला,
उसने केवल एक जीवन नहीं तोड़ा,
उसने मानवता के माथे पर
एक अमिट कलंक छोड़ा।
सरकारों के वादे बहुत हुए,
घोषणाओं के दीप बहुत जले,
पर न्याय की राह में जब तक
जवाबदेही के कदम नहीं चले।
सिर्फ कानूनों की कठोरता नहीं,
विचारों की शुद्धता भी चाहिए,
सिर्फ सुरक्षा के नारे नहीं,
सम्मान की संस्कृति भी चाहिए।
हम बेटियों को डर सिखाते हैं,
रास्तों की सीमाएँ बताते हैं,
पर उन जहरीली मानसिकताओं को
बदलने का साहस क्यों नहीं दिखाते हैं?
कड़वा सत्य यही समाज का है—
चेहरों पर सभ्यता का श्रृंगार है,
पर भीतर कहीं छिपा हुआ
असंवेदनाओं का अंधकार है।
वो पीड़िता केवल एक घटना नहीं,
वो एक जीवित एहसास है,
उसकी खामोशी के पीछे भी
संघर्षों का पूरा इतिहास है।
उसकी आँखों के आँसू पूछते हैं—
क्या इंसानियत अभी जीवित है?
क्या संवेदना के इस युग में
मनुष्यता अभी भी शेष है?
जिस दिन सम्मान संस्कार बनेगा,
जिस दिन सोच की दीवारें गिरेंगी,
उस दिन किसी की खामोश चीख भी
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