आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वही सच में मुसाफ़िर होता है।

                
                                                         
                            मुसाफ़िर हूँ
                                                                 
                            

मुसाफ़िर हूँ,
चलना मेरी फ़ितरत है,
रुक जाऊँ तो लगता है
जैसे साँसों की कोई
कड़ी टूट गई हो।

कभी धूप के साथ चला,
कभी छाँव ने थाम लिया,
कभी रास्तों ने अपनाया,
कभी मंज़िल ने
दूर से ही सलाम किया।

कंधों पर कुछ ख़्वाब हैं,
आँखों में कुछ रास्ते,
दिल में बीती हुई शामें,
और होंठों पर
अनकहे से वास्ते।

जो मिला, उसे अपना माना,
जो छूटा, उसे याद किया,
हर मोड़ ने कुछ सिखाया,
हर ठोकर ने
चलना सिखा दिया।

न कोई शिकवा राहों से,
न मंज़िल से कोई गिला,
जो सफ़र मिला ज़िंदगी में,
उसी को मैंने
अपना काफ़िला माना।

कुछ लोग मिले
तो रास्ते खूबसूरत हुए,
कुछ लोग बिछड़े
तो हम ख़ुद से रूबरू हुए।
किसी ने हाथ थामा,
किसी ने हाथ छोड़ दिया—
हर रिश्ते ने
मुझे थोड़ा और जोड़ दिया।

अब मंज़िल की जल्दी नहीं,
सफ़र का मज़ा लेने लगा हूँ,
गिरता हूँ, संभलता हूँ,
फिर मुस्कुराकर
आगे बढ़ने लगा हूँ।

कौन जाने अगला मोड़
किस कहानी का पता दे,
कौन जाने कोई अनजान राह
किस अपने से मिला दे।

बस इतना यक़ीन है—
जब तक साँसों में रवानगी है,
तब तक रास्ता मेरा है,
और जब तक रास्ता मेरा है,
मैं मुसाफ़िर हूँ…
मुझे चलते रहना है।

मंज़िल मिले या न मिले,
सफ़र अधूरा नहीं होता—
जो रास्तों को जी ले,
वही सच में मुसाफ़िर होता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर