भीग चुकी कचनारों से
ओस भरी दीवारों से
छज्जे की धूप से
फटक के बिखरी जैसे सूप से
लाज भरे आँचलों से
छन छन बिखरती दराजों से
महुआ के बाग से
ताल के उस पार से
आती कुछ प्राण सी
ठहरी हुयी एक सांस सी
गुलाबी सा रंग लिए
धानी चुनर लिए
वासंती सी हवा उङी
सतरंगी नृत्य नची
अल्हड सी बच्ची वो
सर्दी की दस्तक हो
खिड़की के सींखचों पे
पैरों फिसल गयी
सुबह उठी मंद उठी
दोपहर तक छिप गयी
सर्दी की ठंड जो
पल पल बदल गयी।।
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