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जब इंसान हार जाता है

                
                                                         
                            मुकद्दर में लिखा मिट जाता है
                                                                 
                            
हाथों का नसीब लुट जाता है
रंग बिरंगे, चेहरों का नूर
पल भर में ही छिन जाता है
जब इंसान हार जाता है

मेहनत का रंग धुल जाता है
ज़हर चमन में घुल जाता है
ना चाहते, हुए भी जाने
कितना ग़म मिल जाता है
जब इंसान हार जाता है

दुनियां जीती, दुआएं ली थी
पर ज़माना बुरा कह जाता है
कितना मिटूं ज़माने पर मैं ?
सबकुछ ही तो मिट जाता है
जब इंसान हार जाता है...!!

मंजिल पाकर भी अपनी वो
आ ज़मीं पर गिर पड़ता है
आखिर अपने हक़ की खातिर
खुद से भी वो, लड़ पड़ता है
जब इंसान हार जाता है...!!

क्या जीतेगा क्या हारेगा
ये तो तेरा मन ही जाने
पर जीतकर भी देख यहां
तू खुद को हार जाता है
जब इंसान हार जाता है

चाहत वादे सब मर जाते
ज़रा ना दिल में रह पाते
ख्वाहिश हैं नभ जीते तू
पर जमी भी हार जाता है
जब इंसान हार जाता है

 
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2 महीने पहले

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