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वक़्त एक लुटेरा है

                
                                                         
                            वक़्त एक लुटेरा है,
                                                                 
                            
वो हर दिन लूट रहा है मुझे मेरी माँ को,
दिन-दर-दिन,
टुकड़े-टुकड़े करके।

लुटेरा चुराता है धीरे-धीरे,
माँ के बालों का काला रंग,
माँ की आँखों की रोशनी,
माँ की पीठ की सीधाई,
सब कुछ।

लुटेरा माँ के हाथों से
उसकी ताक़त चुरा रहा है,
उसके पैरों से
उसकी रफ़्तार,
उसके दिल से
उसकी धड़कन की गति।

माँ जब सो जाती है
तो मैं देखता हूँ
उसकी साँस,
हल्की, धीमी,
जैसे लुटेरा उसकी साँस भी
धीरे-धीरे चुरा रहा है।

मैं चाहता हूँ
समय रोक दूँ,
माँ को इसी जगह
बाँध दूँ,
पर मैं भी
लुटेरे के साथ चल रहा हूँ।

कोई दिन आएगा
जब लुटेरा माँ को
पूरी तरह चुरा लेगा,
और मैं
अपने अंदर
माँ को ढूँढ़ता रहूँगा,
जैसे माँ हमेशा मेरे अंदर
अपने आप को ढूँढ़ती रही है।

अब मैं समझता हूँ
कि लुटेरे को रोका नहीं जा सकता,
बस माँ के साथ रहना है,
हर पल,
क्योंकि हर पल
जो माँ है
वह लुटेरे के साथ जा रही है।

 
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4 घंटे पहले

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