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रश्क़ ए मुहब्बत

                
                                                         
                            कभी बाहों में जो सिमटे तो फ़ना हो गए,
                                                                 
                            
हम मोहब्बत का मुकम्मल वो समाँ हो गए।

उसका छूना, वो तसल्ली से गले लग जाना,
जिसपे रश्क आए ज़माने को, वो जाँ हो गए।

रू-ब-रू बैठ के सदियों की थकन मिटती थी,
हम अज़ल से ही उसी दर के गदा हो गए।

हाथ छूटा तो बिखरने लगी साँसें अपनी,
एक ही पल में मुक़द्दर भी ख़फ़ा हो गए।

जिस तअल्लुक़ पे ज़माने को भरोसा था कभी,
आज उस मोड़ पे दोनों ही जुदा हो गए।

अब तो तस्वीर ही सीने से लिपट रोती है,
हम भरी बज़्म में तन्हाई की सदा हो गए।

दर्द-ए-फ़ुर्क़त में लिए फिरते हैं वीराँ आँखें,
हाय! 'शिबली' भी उसी इश्क़ में क्या हो गए!
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एक घंटा पहले

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