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फ़िर वो तन्हाई में सर को झुका के बैठेगा ग़ज़ल

                
                                                         
                            ख़फ़ा हुआ जो वो, बहुत दूर जाके बैठेगा
                                                                 
                            
वो फिर कभी न मेरे पास आके बैठेगा
वो जानता है शहर में मेरे दुश्मन हैं बहुत
वो मेरे दुश्मनों के साथ जाके बैठेगा
बड़ा ज़िद्दी है वो, मेरा हाल तक न पूछेगा कभी
मैं मर गया तो मेरी क़ब्र के पास जाके बैठेगा
सुनेगा जब वो मेरे ग़म-ए-जुदाई की दास्ताँ
फिर वो तन्हाई में सर को झुका के बैठेगा
ख़बर है उसको, बिछड़कर मैं जी नहीं सकता
इसीलिए वो मेरे सामने फिर मुस्कुरा के बैठेगा
जलाल, उठ के निखर ने का वक़्त सामने है
गया वो शख़्स तो क्या, तू मुह छुपा के बैठेगा
—मोहम्मद अजरम जलाल
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2 घंटे पहले

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