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मेरी नानी

                
                                                         
                            मेरी नानी
                                                                 
                            
एक गाँव था,
एक मिट्टी का घर था,
और उस घर में रहती थी
मेरी नानी।
वो घर सिर्फ़ घर नहीं था,
उनके पति की आख़िरी निशानी था,
इसलिए उनके जाने के बाद भी
नानी ने उस चौखट को नहीं छोड़ा,
जैसे कुछ घर ईंटों से नहीं,
यादों से बने होते हैं।
खेत सूने हो गए,
आँगन ख़ामोश हो गया,
और ज़िंदगी धीरे-धीरे
उनके हिस्से की भीड़ ले गई।
फिर भी वो वहीं रहीं
अकेली,
मगर अपनी यादों के साथ।
उनका बेटा शहर में था,
बहू और बच्चे भी वहीं,
और नानी के हिस्से में रह गया
एक गाँव, एक घर, कुछ खेत,
और एक लंबी-सी ख़ामोशी।
कभी-कभी सोचती हूँ
जिस रास्ते पर मेरे छोटे-से पैर
चलते-चलते थक जाते थे,
उसी रास्ते को नानी
अकेले कैसे पार करती होंगी?
शायद उम्र ने उनके पैरों को नहीं,
उनके हौसले को मज़बूत किया था।
मुझे आज भी वो बाज़ार याद है
नानी के साथ चलना,
अपनी पसंद की चीज़ें लेना,
और उनके हाथों से
छोटे-छोटे निवाले खाना।
और फिर वो आवाज़—
“मिष्टू…”
मेरे लिए वो सिर्फ़ नाम नहीं था,
वो उनका प्यार था।
एक ऐसा नाम
जो दुनिया में किसी और की आवाज़ में
कभी अपना-सा नहीं लगेगा।
बंगाल की मिठास लिए वो नानी,
रसगुल्ले-सी मीठी,
लेकिन अपनी ज़िंदगी में
कितने कड़वे घूँट पी गईं,
ये दुनिया शायद कभी जान ही नहीं पाई।
पति के जाने का दुःख,
अकेलेपन की रातें,
अपनों की शिकायतें,
और फिर बीमारी,
उन्होंने हर दर्द को
अपनी साड़ी के पल्लू में बाँधा
और मुस्कुराकर जीती रहीं।
फिर 21 अक्टूबर 2024 की वो तारीख़ आई,
जिसने मेरी दुनिया से
एक इंसान नहीं,
मेरी “मिष्टू” कहने वाली आवाज़ छीन ली।
आज भी कभी उस गाँव की कल्पना करती हूँ,
तो लगता है
शायद वो उसी घर की चौखट पर बैठी हैं,
खेतों को देख रही हैं,
और मुझे दूर से देखकर
फिर वही कह रही हैं—
“मिष्टू …”
काश, समय एक बार पीछे लौटे,
तो मैं उनके साथ उस बाज़ार तक
थोड़ा और चलूँ।
इस बार
अपने पैरों के दर्द की शिकायत नहीं करूँगी।
बस उनके पास चलती रहूँगी
क्योंकि अब समझ आया है,
वो रास्ता बाज़ार तक नहीं जाता था,
वो रास्ता मुझे मेरी नानी तक ले जाता था।
और अब वो नहीं हैं,
पर उनका “मिष्टू"
मेरे भीतर कहीं अब भी ज़िंदा है।
दुनिया के लिए वो कांति देवी थीं,
मेरे लिए
वो मेरी नानी थीं।
और मेरी नानी के लिए,
मैं हमेशा उनकी “मिष्टू” रहूँगी।

-मिताली उपाध्याय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

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