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शीर्षक: बंद कमरे की कहानी

                
                                                         
                            एक बंद कमरा, कुछ किताबें और आँखों में ढेरों ख्वाब हैं,
                                                                 
                            
कोई कैसे समझे इस खामोशी में, कितने अनकहे जवाब हैं।
हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर मैं खुद को जगाती हूँ,
और हर रात एक नाकामयाब दिन का बोझ लेकर सो जाती हूँ।

अपनों की उम्मीदें अब कंधों पर भारी लगने लगी हैं,
दोस्तों की तरक्की देखकर, अपनी जिंदगी हारी लगने लगी है।
त्योहारों पर घर जाने की हिम्मत अब नहीं होती,
क्योंकि हर कोई पूछता है—"नौकरी कब है लगती?

"वो माँ का छुपकर दुआएं मांगना,
वो पिता का फिक्र में ढलना,
उनकी बूढ़ी आँखों के लिए ही तो है,
मुझे अंगारों पर चलना।
ऐसा नहीं कि थक गई हूँ या अब कोशिश नहीं करता,

पर हर असफलता के बाद,
मेरा एक हिस्सा है मरता।
ये सिर्फ एक करियर की जंग नहीं,
मेरी पहचान की लड़ाई है,
जिंदगी ने इस मोड़ पर लाकर मेरी हर परीक्षा ली है।

सिसकियाँ छुपाकर हँसना सीख लिया है मैंने,
अपनी किस्मत से लड़ना सीख लिया है मैंने।
भले ही आज आँखें नम हैं और दिल में एक समंदर है,

पर याद रखती हूँ हमेशा,
कि एक फौलाद मेरे अंदर है।
आज रो लेने दो इस दिल को,
कल फिर उठना ही होगा,
इस टूटते हुए हौसले को,
फिर से बुनना ही होगा।
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एक घंटा पहले

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