सुबह से शाम, शाम से ढलती रात,
मेरी खुद से ही कोई बात नहीं हो पाती।
दुनिया से मिलने का आख़िर क्या अर्थ,
जब मेरी खुद से ही मुलाकात नहीं हो पाती।
दिशाएँ धुंधली हैं, वजूद अजनबी सा लगता है,
मेरी मंज़िल का मुझे कोई निशान नहीं मिल पाता।
— मेघा रघुवंशी
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