मंजिल से भटकी हूं या मंजिल ही ना पता
पता सबकुछ है, फिर कैसे कह दूं खुद को लापता
कहने को बहुत है राहे, पर चुनना आसान कहां
चुन भी लूं, तो मन लगे, वो बात कहां
थोड़ी अधूरी, थोड़ी घायल परिंदे जैसी है जिंदगी
करना चाहती सबकुछ हूं, पर कब करना, कुछ पता ना
यूं ही थोड़े दूर सबसे, थोड़े पास सबके हूं
मन लगे किसीसे, किसी में वो बात कहां
यूं खुद को यूं नाराज कबतक करती रहूंगी, क्या पता
क्या चल रहा है अंदर, ये भी मालूम कहां
जीवन को मिले सार्थक दिशा, वो राह भी देखूं कहां
अब तो सपने भी नहीं बुनती, उनतक पहुंचने की जिद्द करूं क्या!
-मेघा रघुवंशी
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