आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शीर्षक - रसिक

                
                                                         
                            रसिको में रसिक थे हम भी गजब के |
                                                                 
                            
गुलदार हिज्र के ना पूछो ||
किस्से कहाँ अब रांगिनी लिए फिरते हैं |
बेमतलब सा है आलम ||
फिजा मे जहर घुल गये अब |
और हम सब्र लिए फिरते हैं ||
नगम अब कोई गाता नहीं |
बस अब साज सुर लगे हुऐ हैं ||
मरम्मत जख्मो की करता नहीं कोई |
चाकू सी धार लिए फिरते हैं ||
हर सांस बस जाया हो रही है |
हिज्र की टुक में बस चूक हो रही है ||
-  मीरा रानी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर