रसिको में रसिक थे हम भी गजब के |
गुलदार हिज्र के ना पूछो ||
किस्से कहाँ अब रांगिनी लिए फिरते हैं |
बेमतलब सा है आलम ||
फिजा मे जहर घुल गये अब |
और हम सब्र लिए फिरते हैं ||
नगम अब कोई गाता नहीं |
बस अब साज सुर लगे हुऐ हैं ||
मरम्मत जख्मो की करता नहीं कोई |
चाकू सी धार लिए फिरते हैं ||
हर सांस बस जाया हो रही है |
हिज्र की टुक में बस चूक हो रही है ||
- मीरा रानी
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