मैं तेरे कटघरे में खड़ी गुनाहगार की तरह
पर मजे की बात। मुझे पता ही नहीं
मेरा गुनाह क्या है
मेरा गुनाह तेरे मन का फितूल है
बैठा है तेरे जहन में कचरा ज़रूर है
एक कटघरा बनाया
फिर गुनाह डाला
तर्क वितर्क करके
जेल सुना डाला
अकाल मृत्यू रिश्ते की मन का फितूल कर गया
मन तो निर्मल हुआ नहीं सारा जीवन गुजर गया
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