आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हालात

                
                                                         
                            बो मां जो कभी एक थी
                                                                 
                            
टुकड़ों में बट गई
उलझी हुई रिश्तों में
उलझन में फस गई
अपना खून भी मजबूर हो गया
बो लाचार बेबस तो बेटा मौन हो गया
जब तुलता है प्रेम उसका तर्क वितर्क के तराजू में
कलेजा धक से होता है
हृदय आघात होता है
बस उसे आभास होता है
सभी रिश्ते खोखले फुफकार मारते हैं
कि सबब मिल गया अब देखते रहे
बस मौन हो जाये बस मौन हो जाये
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर