गृहस्थ जीवन के कुरुक्षेत्र में
जब मैं अर्जुन बन गई
छोड़ के सारे रिश्तों को
प्रभु तेरा सुमिरन कर गई
कुछ अद्भुत सा पाया मैंने
टूट के फिर से जुड़ गई
फंसी हुई थी मकड़जाल में
स्वछंद गगन में उड़ गई
जीवन का मैं सार समझ गई
बहते दरिया से पार उतर गई
है न्याय प्रभु तेरे चरणों में
आभास बहुत कुछ कर गई
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