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जब-जब जड़ता ने मन पर अपने ताले जड़ डाले

                
                                                         
                            जब-जब जड़ता ने मन पर अपने ताले जड़ डाले
                                                                 
                            
तब-तब तेरी विपंची ने मौन हृदय में स्वर ढाले

विपंची का एक-एक स्वर वेदों का उद्घोष बने
मूक अधरों की मौन व्यथा भी मधुर प्रार्थना-कोष बने

तेरी विपंची की झंकारों से ऋचाओं का विस्तार हुआ
अक्षर-अक्षर सत्य लिखा मानव का नव श्रृंगार हुआ

हे शारदे! ऐसा वर देना मन निर्मल निश्छल प्रीति बने
मेरी लेखनी की हर धड़कन ...तेरा ही संगीत बने

-मीना गोपाल त्रिपाठी
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2 महीने पहले

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