आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नागाह

                
                                                         
                            एक जुगनू चमक उठा नागाह पीपल की शाखों से..
                                                                 
                            
मुस्कुरा कर कह गया कुछ... स्याह काली रातों से!

तू अंधेरों की हुकूमत पर भले नाज़ां रहे..
मिट जाएगी ये तीरगी चाहे घनेरा अंधेरा रहे!

मैं उजालों की विरासत का बड़ा वारिस नहीं..
है मगर फ़ितरत ही मेरी..अंधेरों से बगावत की!

एक भरम पाल लिया.. अंधेरों ने ख़ुद से ख़ुद में..
कि,उलझ गया वो स्याह नागाह, एक जुगनू से जद्दोजहद में!
- मीना गोपाल त्रिपाठी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर