नेत्रों में ज्वाला धधक रही भृकुटि में प्रलय समाया था!
अस्त्र-शस्त्र खड्ग देखकर काल स्वयं थर्राया था!
दस भुजाओं में दिव्य शक्ति,अधरों पर हुंकार थी भारी!
रणचंडी के रूप में उतरी थीं करने दुष्ट-संहार माँ काली!
खड्ग उठा तो दिशाएँ काँपीं, काँपा सकल जहान!
रणभूमि में गूँज उठा फिर, मां दुर्गा कल्याणी का नाम!
महिषासुर का दर्प देखकर, प्रचण्ड चण्डिका मुस्काईं!
दिव्यास्त्रों की ज्वाला से, दानव-शक्तियाँ थर्राईं!
महिषासुर का मद मर्दित कर, रणचण्डी ने हुंकार भरी!
दुष्ट-दलन कर, धर्म-संस्थापन की दिव्य ज्योति प्रखर करी!
त्रिशूल-प्रहार से ध्वस्त हुआ, महिषासुर का दर्प महान!
दिव्य दुन्दुभि निनादित हुई, जयमय हुआ त्रिभुवन-धाम!
-मीना गोपाल त्रिपाठी
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