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आज का शब्द दुरंत

                
                                                         
                            दुरंत समय जब जब आता
                                                                 
                            
मानव का धैर्य परखता है
सुख के पलों का अजगर बन
भीतर ही भीतर डसता है

दुरंत अँधेरों की बाँहों में
कितने सूरज सो जाते हैं
पर कुछ साहस के प्रहरी
तम से लड़कर मुस्काते हैं

दुखों की तपती भट्ठी ही
सोने को कुंदन करती है
लहरों से लड़ने वाली कश्ती
ही दरिया पार करती है

जीवन में भले ही पड़ता
सहना दुरंतों का आघात
सबसे काली रात के आगे
उगता ही है स्वर्णिम प्रभात
- मीना गोपाल त्रिपाठी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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