जिन कंधों पर है सजा तिरंगा उन कंधों का मान कहां
जिस मिट्टी में रक्त मिल उसका अब सम्मान कहां
हंसते-हंसते शीश कटाने वालों की सौगंधों पर
रीलों की चकाचौंध तले बचा शहादत-गान कहां
कभी भगत की आँखों में था आज़ादी का स्वर्ण-सवेरा
अब विवेक को निगल रहा है नफ़रत का तिमिर घनेरा
तब वंदे मातरम् धड़कन था भारत जीवन-मंत्र बना
अब अंतर्मन में द्वेष छिपा है मन षडयंत्रों का मंच बना
तब माँ पुत्र से कहती थी..देश प्रथम फिर अपना घर
अब संस्कारों की चौखट पर, स्वार्थ खड़ा है ताने सर
वीरों की तस्वीरों पर हम पुष्प अर्पित कर लौट गए
उनके आदर्शों पर चलना आख़िर कैसे भूल गए
नए भारत के ऐ नौजवानो! तुममें भी अब वही ज्वाला हो
भारत माँ की आन बचाने हर युवा स्वयं एक भाला हो
स्वतंत्र हवा में साँस मिली है इसकी कीमत जानो तुम
शहीदों के सपनों वाला.. भारत फिर से पहचानो तुम
रील छोड़ अब रीढ़ संभालो पुरखों की थाती को देखो
फेसबुक की पोस्टों से आगे, सीमा की माटी को देखो
जिस दिन हर युवा भगत बनेगा टूटेंगे नफ़रत के घेरे
उस दिन सच्चे अर्थों में होंगे आज़ादी के स्वर्ण-सवेरे
- मीना गोपाल त्रिपाठी
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