आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अमरकंटक वंदना

                
                                                         
                            मैकल के भाल पर जब उषा स्वर्णिम तिलक सजाती है!
                                                                 
                            
देवभूमि के कण-कण में तब प्रकृति आरती गुनगुनाती है!!

जहाँ विंध्य और सतपुड़ा मौन तपस्या करते हैं!
जिनके चरण पखार नर्मदा शत-शत वंदन करती है!!

जहाँ माँ नर्मदा की कल-कल अनहद नाद जगाती है!
जहां नर्मदा शिव के चरणों में नित अर्ध्य चढ़ाने जाती है!!

तेरी गोदी की तीन सरिताएँ वेद-ऋचाएँ गाती हैं!
नर्मदा, सोन, जोहिला बन भू का सौभाग्य जगाती हैं!!

कपिलधारा के तप-कुंजों में ऋषियों की साधना बसती है!
दुग्धधारा की धवल सलिला अमृत-रस बन बरसती है!!

साल-सागौन के हरित वन मलयानिल से लहराते हैं!
पत्तों-पत्तों पर देव-स्वर बन विहग मंगल गान गाते हैं!!

हे अमरकंटक! मैकल-मुकुट,यह भूमि तप-साधना की है!
माँ नर्मदा की जन्मधरा,भारत की पावन आराधना की है!!

तेरे कण-कण में शिव का स्पंदन, तेरी रज-रज प्रणम्य है!
शत-शत नमन हे पुण्य धरा! तू नर्मदा का दिव्य उद्गम है!!
- मीना गोपाल त्रिपाठी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर