मैकल के भाल पर जब उषा स्वर्णिम तिलक सजाती है!
देवभूमि के कण-कण में तब प्रकृति आरती गुनगुनाती है!!
जहाँ विंध्य और सतपुड़ा मौन तपस्या करते हैं!
जिनके चरण पखार नर्मदा शत-शत वंदन करती है!!
जहाँ माँ नर्मदा की कल-कल अनहद नाद जगाती है!
जहां नर्मदा शिव के चरणों में नित अर्ध्य चढ़ाने जाती है!!
तेरी गोदी की तीन सरिताएँ वेद-ऋचाएँ गाती हैं!
नर्मदा, सोन, जोहिला बन भू का सौभाग्य जगाती हैं!!
कपिलधारा के तप-कुंजों में ऋषियों की साधना बसती है!
दुग्धधारा की धवल सलिला अमृत-रस बन बरसती है!!
साल-सागौन के हरित वन मलयानिल से लहराते हैं!
पत्तों-पत्तों पर देव-स्वर बन विहग मंगल गान गाते हैं!!
हे अमरकंटक! मैकल-मुकुट,यह भूमि तप-साधना की है!
माँ नर्मदा की जन्मधरा,भारत की पावन आराधना की है!!
तेरे कण-कण में शिव का स्पंदन, तेरी रज-रज प्रणम्य है!
शत-शत नमन हे पुण्य धरा! तू नर्मदा का दिव्य उद्गम है!!
- मीना गोपाल त्रिपाठी
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