हर बार टूटकर भी संभलना पड़ा मुझको
बड़े सब्र से ज़िंदगी ने तराशा है मुझको
खुशी मिली तो सबने किया शुक्राना अदा 'उसका'
मैं ग़म में भी मुस्कुराती रही ये भी तो है सिला 'उसका'
धूप मिली तो उसे भी मैंने अपनाया है
छाँव मिली तो उसे भी अंग लगाया है
जो मिला,जैसा भी मिला सबको गले लगाया
कुछ इस तरह मैंने 'उसका' शुक्रिया निभाया है
- मीना गोपाल त्रिपाठी
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