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दिल परिंदा भी तो घबराता है ज़ेरे दाम से

                
                                                         
                            कुछ भी हासिल हो नहीं पाया है क़त्ले आम से
                                                                 
                            
बात जाकर कह दे कोई बे-रहम हुक्काम से

अब पुकारें ही नहीं कोई हमें तो नाम से
इश्क़ जब से है हुआ हम तो गए हैं काम से

होश रहता है कहाँ पी के बहक जाते हैं हम
कर ली तौबा हमने आँखों के नशीले जाम से

चैन मिलता ही नहीं अब क़स्र-ए-आलीशान में
दिल परिंदा भी तो घबराता है ज़ेरे दाम से

ज़िंदगी ने चैन से हमको नहीं रहने दिया
आरज़ू है मौत ले जाए हमें आराम से

ख़्वाब आँखों से जुदा हैं मंज़िलें कोई नहीं
यूँ गुज़रना हो रहा है गर्दिशे-अय्याम से

इश्क़ करने की तमन्ना मेरी कब पूरी हुई
ख़ौफ़ खाते ही रहे मीना ग़लत इल्ज़ाम से
-मीना भट्ट सिद्धार्थ
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एक घंटा पहले

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