आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल

                
                                                         
                            मौत की किसने भला दुनिया में भरपाई की
                                                                 
                            
शख़्स जो भी मिला उसने ही शनासाई की

राह चलता हुआ राही भी ठहर जाता है
बात चलती है सनम जब तेरी अँगड़ाई की

पास दौलत है मगर फिर भी परेशान है वो
आह जैसे हो लगी उसको सगे भाई की

बेगुनाहों को सज़ा तय थी बहुत पहले से
सच है क्या उसकी अदालत ने न सुनवाई की

तेरे आँचल में ज़माने के ख़ज़ाने हैं माँ
तेरी ममता की नहीं हद कोई गहराई की

यूँ तो हासिल हैं सुहूलात सभी महलों में
बात कुछ और थी बाबुल तेरी अँगनाई की

बेसहारों को सभी ज़ख़्म दिया करते हैं
क्या कभी उनकी किसी ने भी मसीहाई की

आज भी नींद उड़ा देती हैं आँखों की मेरे
याद आती हैं जो रातें ग़म-ए-तन्हाई की

इश्क़ की करते इबादत उसे माना है ख़ुदा
फ़िक्र की हमने न मीना कभी रुसवाई की
-मीना भट्ट सिद्धार्थ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर