मौत की किसने भला दुनिया में भरपाई की
शख़्स जो भी मिला उसने ही शनासाई की
राह चलता हुआ राही भी ठहर जाता है
बात चलती है सनम जब तेरी अँगड़ाई की
पास दौलत है मगर फिर भी परेशान है वो
आह जैसे हो लगी उसको सगे भाई की
बेगुनाहों को सज़ा तय थी बहुत पहले से
सच है क्या उसकी अदालत ने न सुनवाई की
तेरे आँचल में ज़माने के ख़ज़ाने हैं माँ
तेरी ममता की नहीं हद कोई गहराई की
यूँ तो हासिल हैं सुहूलात सभी महलों में
बात कुछ और थी बाबुल तेरी अँगनाई की
बेसहारों को सभी ज़ख़्म दिया करते हैं
क्या कभी उनकी किसी ने भी मसीहाई की
आज भी नींद उड़ा देती हैं आँखों की मेरे
याद आती हैं जो रातें ग़म-ए-तन्हाई की
इश्क़ की करते इबादत उसे माना है ख़ुदा
फ़िक्र की हमने न मीना कभी रुसवाई की
-मीना भट्ट सिद्धार्थ
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