नफरतों का दौर है ये निकल जायेगा
हालात मुश्किल हैं ये संभल जायेगा
किसी एक का हुकूमत सदा चलता नहीं
थोड़ी ही दिनों में ये बदल जाएगा
सर पर ताज है तो गुरूर ना कर
एक दिन जमीन तुम्हें निगल जाएगा
मुसीबत कितनी ही बड़ी क्यों ना हो
वक्त के साथ-साथ ये टल जाएगा
नदियों से मिल्लत का ये हुनर सीखो
जाकर दरिया में फौरन मिल जायेगा
उगता हुआ सूर्य का तेवर तो देखो
शाम होते ही ये ढल जायेगा
बुलंदी मिलती है मोहब्बत से इफ्तेखार
नफरत तो नीचे से फिसल जायेगा
-इफ्तेखार
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