क्या सड़क किनारे सपनों से भरे रंग बिरंगे गुब्बारों को तुमने कभी देखा है
गौर से देखो उन धागों को थामे रंगों के नीचे एक छोटा सा बच्चा रहता है
रो देती है सड़क भी जब वह तपती दोपहरी अपने नंगे पांव निकलता है
उस पर भी हँसता है वो जब दो आने का कोई उससे मोल भाव करता रहता है
ज़िंदगी बेईमान नहीं ये देख बताओ कौन कम्बख़्त कह सकता है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X