रोज़ सुबह ख़ुद को न पूछो किस तरह उठा लेते हैं
आज अलग सी होगी ज़िंदगी कहकर उम्मीद को मना लेते हैं
शाम ढले मायूसी तले चेहरे पर एक हँसी सी बना लेते हैं
शाम सुबह से कुछ कह ना दे बहाने कुछ ऐसा बना देते हैं
मिली थीं ख़ुशी पास ही के मॉड पर ये झूठ फैला देते हैं
नाउम्मीदी हमारी कहीं दिख ना जाये उसे यूँ छिपा देते हैं
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