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मेरी झोपड़ी तुम्हारा महल

                
                                                         
                            मेरी झोपड़ी हंस पड़ी एक रोज़ महल की शान पर
                                                                 
                            
तुम कहाँ सहते भला ये आघात था आम का तुम्हारी ख़ास सी शान पर
तुड़वा दिया तुमने उसे मेरी चीखें पहुँची नहीं तुम्हारी ऊँचे आसमान पर
सोचा तो होगा तुमने पर टटूटूँगा थोड़े ही इतनीमैं सी बात पर
समेट लूँगा मुट्ठी भर सामान मेरा और सो लूँगा फ़ुटपाथ पर
पर सोचो जरा जिस दिन मैं कुदाल चलाऊँगा
तुम्हारे महल की दीवार पर
अपना अहम समेट कैसे जीयेगे असलियत की ताल पर
सामान समाएगा कहाँ तुम्हारा किसी अदना से फ़ुटोआथ पर
सड़क से लंबा तो तुम्हारा रुतबा ही होगा
कैसा रहेगा वो वजूद तुम्हारा ऐसे आम लोगों वाले हाल पर
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2 महीने पहले

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