ठंडे से निश्तेज क्षितिज पर सूरज बन खौलूँगा
मैं तुम्हारी सुषुप्त चेतना पर सुविचार बन कौंधूँगा
जितना भी हो क्षुब्ध विवेक मैं निर्भीक ऋतंभरा बन डोलूँगा
डिग जाओ तुम अपने पाथ से ये अज्ञानवश ना होने दूँगा
मै मानस विरक्त लोभ से सदा सत्य बोलूँगा
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