लिहाज़ है दस्तूर का तो रोज़ जी लेते हैं
लेकिन मिजाज़ है आज क़सूर का तो सोचा पूछ लेते हैं
फ़राज़ नसीब है उनको और क्यों हम ज़मीन को तरसते हैं
नवाज़ तू उनके लिए और हम बस इम्तिहान देते हैं
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