क्यों रोज़ को रोज़ बदलने की सोचा करें
क्यों कल के लिए आज से यूँ तकरार करें
ज़िंदा हैं साथ हैं काफ़ी है इतना
फिर भला क्यों ज़िंदगी से इस क़दर गिला करें
पैसे कम हैं जेब में ये भी मालूम है हमें , जो साथ हैं
वो लम्हे क्यों उन्हें गिनकर ज़ाया करें
सूखे से निवालों का कब तक लेंगे हिसाब उस टूटी सी प्लेट से चलो ना इन अनमनी से चप्पलों में हाथ में हाथ डाल थोड़ी तफ़री करें
ना मानो तो चलो तुम सपने भी देख लेना
हमारी तो ख्वाहिश बस इतनी की हम तुम्हें देखा करें
जगमगाहट नहीं है इस घर में भले माँ किया
चलो इसे अपने अंधेरों से रोशन करें
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