कुछ तो बात रही होगी
ज़िंदगी के रूठे रहने की आख़िर कुछ तो वजह रही होगी
मुमकिन हैं जीने के दस्तूर की समझ हमें ही कम रही होगी
या उन महलों में जो उसको पसंद हो कुछ ऐसी बात रही होगी
वरना यूँ ही तो कोई रूठ नहीं जाता
कोई तो खता हुई होगी
तभी खुशनुमा ज़िंदगी के किस्सों में हमारा ज़िक्र नहीं आता
सबके पतों पर पहुँच जाती है हँसी बस उसे एक हमारा ही घर नज़र नहीं आता
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