हो जीत हार और रण अपार
या शीतल गंगा की निर्मल धार
अरुण एक सा रथ नित्य लिए चले आता है
रक्त रंजित सा नम हो रज कण
या शुष्क मरु का विस्तार ही
जीवन रथ एक सा पुरुषार्थ दिखाता है
रक्त रंजित हो तीखी अस्त्र धार
या अटी भूमि दिखलाये मसान सार
वीर कहाँ पलकों पर अश्रु बोझ उठता है
हो एक भले अनेकों के सम्मुख
वो वीर तभी जान अकेला साहस दिखलाता है
विफल नहीं तुम होनहार गए
जड़ होंजाना हार कहलाता है
चलो वीर आगे बढ़ो देखो जीवन अट्टहास लगता है
सीखो तनिक अपने सपनों से
तम गहरा हो परिस्थिति का पहरा
भला क्या कोई उसे फिर भी रोक पाता है
जीवन रथ को निर्बाध नहीं
निर्भीक हाँका जाता है
जो रक्तरंजित हो रण करे
ना जीत हार को ध्यान धरे
वही वीर कहलाता है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X